सांस्कृतिक एवं धार्मिक संदर्भ


सर्वेश्वर सिर्फ साहित्यकार एवं पत्रकार न थे, कला, संस्कृति एवं रूपंकर कलाओं के वे बड़े समीक्षक एवं प्रशंसक थे । सांस्कृतिक आयोजनों में राजधानी में उनकी उपस्थिति अनिवार्य मानी जाती थी । नाटक के क्षेत्र में उन्होंने बकरी, अब गरीबी हटाओ जैसे नाटक लिखकर एक अलग जगह बना ली थी । उन्होंने सांस्कृतिक संदर्भों, कला एवं संस्कृति पर काभी लिखा है । नृत्य, संगीत, कला, नाटक, साहित्य कोई ऐसा क्षेत्र न था जहाँ सर्वेश्वर की नजर न गई हो और उन्होंने कलम न चलाई हो । सामाजिक बदलाव में इन कलाओं की भूमिका का भी वे निरंतर विचार करते रहे । कला के माध्यम से मनुष्य की संवेदना को कितना बचाया और रखाया जा सकता है, ये सवाल बराबर उनके दिलो दिमाग को स्पंदित करते रहते थे। सर्वेश्वर निश्चय ही ऐसे क्रांतिकारी विचारकों में नहीं थे, जो यह मानते हैं कि शास्त्रीय संगीत और नृत्य जैसी कला विधाएं सांती समाज की देन हैं और उन्हीं के हितों की रक्षाकरती हैं । सर्वेश्वर ऐसे सवालों से बचते थे । वे मानते थे कि कला मानव संवेदना को बचाए एवं जिलाए रखने का एक बड़ा माध्यम है । वे ‘विचारधारा और संगीत’ नामक टिप्पणी में लिखते हैं – “भारतीय संगीत में जो राग हैं, उन्हें साधक के स्वर में सुनें तो वे आपकी संवेदना को मानवीय बनाते हैं, जिसमें आपके विचार की और प्रतिरोध की शक्ति बढ़ती है । हाँ, पाश्चात्य संगीत में एक अतिरिक्त गुण है कि वह नाटकीय होता है, जबकि भारतीय संगीत छन्दमय होने के कारण नृत्य के अधिक निकट रहता है । इतना ही नहीं, आप इस संगीत को आत्मस्थ करते हुए दृश्य और स्थितियों की ज्यादा तीव्रता से प्रतीति करते हैं । भैरवी को सुनते हुए क्या आपने सुबह को अनुभव करने की कोशिश की है ? शायद वह तब वही सुबह नही होती जो भैरवी के अभाव में थी । भैरवी सुबह के साथ आपके तादात्म्य को और घना कर देती है । और इस तरह आप जीवन की स्वाभाविकता का अनुभव और भी तीव्रता से करते हैं । और आप एक संपूर्ण जीवन जीने की ओर बढ़ते हैं ।”22
(चरचे और चरखे, पृ. 193)

सर्वेश्वर रंगमंच के क्षेत्र में चल रही हलचलों पर भी नजर रखते थे । उन्होंने समूचे रंगजगत के परिवेश एवं वातावरण का गहन अध्ययन किया था । वे मंच की आवश्यकता एवं मंच की मजबूरियों को समझते थे । हिंदी रंगमंच में हो रहे नए प्रयोगों, बदलावों को उन्होंने करीब से देका । मोहन राकेश से लकर बादल सरकार का दौर उनके नाटकों की विषयवस्तु एवं लोकप्रियता का ग्राफ उठता-गिरता देखा । बाद के दौर में सर्वेश्वर स्वीकारने लगे थे कि अब हिंदी रंगमंच की हवा काफी कुछ बदल रही है। स्त्री-पुरुष संबंधों की परिधि तोड़कर अब नाटक आज की सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों एवं विद्रूपताओं की ओर जा रहे हैं । हिंदी में राजनीतिक नाटकों के अभाव के बावजूद हिंदी रंगमंच का मानस बदल रहा है । वे स्वीकारते हैं कि हिंदी रंगमंच के समांतर यह बदलाव साहित्यिक क्षेत्र में बहुत धीमा है । राजनीतिक नाटकों को व्याख्यायित करते हुए वे लिखते हैं – “राजनीतिक फिकरेबाजी, राजनीतिक नाटक नहीं हैं । ना ही भौंड़े व्यवस्था विरोध का नाट, राजनीतिक नाटक है । राजनीतिक नाटक ज्यादा गहरी चीज है ।... राजनीतिक नाटक सामाजिक-राजनीतिक बुनावट को, उसके आर्थिक ताने-बाने को वर्गचेतना के साथ गहराई से प्रस्तुत करता है।... सही अर्थों में राजनीतिक नाटक शोषण और अन्याय को जन्म देने वाली ताकतों पर प्रहार करता है । उसकी जड़ पर प्रहार करता है, केवल उसकी डालियां नहीं काटता ।”23
(चरचे और चरखे पृ. 195)

सर्वेश्वर मानते हैं कि रंगमंच को जनचेतना की जागृति में सहायक बनना चाहिए । सत्ता एवं मंच के तालमेल के वे खिलाफ थे । वे चाहते थे कि हिंदी का नाटककार इसके लिए तैयार हो । रंगजगत को बदलती दुनिया के मद्देनजर बदलते देखना चाहते थे ।

सर्वेश्वर के मन में कलाकारों के प्रति बड़ा सम्मान था । वे कलाकारों के साथ हो रहे अन्याय पर विचलित हो जाते थे । ऐसी तमाम घटनाओं पर वे अपनी प्रतिक्रिया दर्ज करते थे । दिनमान में ‘दूसरों की भावना और अपनी संस्कृति’ नामक टिप्पणी में उन्होंने प्रख्यात नृत्यांगना भारती शिवाजी के साथ हुए अन्याय को रेखांकित किया था । सर्वेश्वर लिखतेहैं “भारती शिवाजी युना कलाकारों में अपनी मौन साधना, विनयशीलता और प्रतिभा में अनन्य मोहनीअट्टम की वह सर्वोत्तम कलाकार हैं ।” इस प्रसंग में नृत्यांगना को करांची स्थित भारतीय दूतावास में नृत्य हेतु आमंत्रित किया गया था, वह तैयारी करती है । फिर वह कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया जाता है । एयरपोर्ट पर उन्हें यह खबर मिलती है । नृत्यांगना के इस अपमान पर सर्वेश्वर आहत हो उठते हैं । वे लिखते हैं – “सांस्कृतिक जगत को इस स्थिति पर चुप नहीं रहना चाहिए और करांची स्थित भारतीय दूतावास को इसके लिए क्षमा मांगनी चाहिए और इस संदर्भ में अपनी सांस्कृतिक नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए ।”24 (चरचे और चरखे पृ. 204) संस्कृति कर्मियों के साथ हो रही शासकीय उपेक्षा को वे अमर्यादित आचरण मानते हैं । सर्वेश्वर संस्कृति कर्मियों की उपेक्षा के सवालों पर बराबर दिनमान में लिखते रहे ।

सर्वेश्वर आम भारतीय समाज में चल रहे उत्सवों एवं आयोजनों में एक जीवंतता एवं विशिष्टता के दर्शन करते थे । छोटे-छोटे स्थान पर हो रहे सांस्कृतिक धार्मिक आयोजनों पर उनकी नजर ठहर जाती थी । वे उन्हें रेखांकित करते थे । बुरहानपुर (मध्यप्रदेश) में चलने वाली एक प्रसिद्ध नवरात्रि की चर्चा करते हुए उन्होंने रोशनी का दायरा नामक अपने एक लेख में इस प्रयास की सराहना की है । दीपावली के अवसर पर प्रतिवर्ष होने वाली इस व्यख्यानमाला में तमाम विद्वान, राजनेता आ चुके हैं । इस प्रसंग को याद करते हुए वे लिखते हैं – “दीपावली पर इस व्याख्यानमाला को याद करने का खास मतलब है । हमारे पर्व और त्यौहार हमारे संस्कारों की रोशन हैं । युगों से चली आ रही हमारी चेतना को उजाला देते हैं । लेकिन यह चेतना एक सीमित आलोकवृत्त में सिमट कर रह गई है । जरूरत है इस दायरे को बढ़ाने की ।”25
(चरचे और चरखे पृ. 209)

सर्वेश्वर मानते हैं कि ऐसे प्रसंगों का इस्तेमाल सामाजिक, राजनीतिक जागरूकता बढ़ाने के लिए किया जा सकता है । पुरानी आस्था नए युग विवेक से जोड़ी जा सकती हैं । राम-रावण की लड़ाई को आगे बढ़ाकर जनता को अन्याय के खिलाफ क्यों खड़ा नहीं किया जा सकता । वे चाहते थे सांस्कृतिक पर्वों, त्यौहारों पर हो रहे आयोजन सिर्फ मेले-ठेले बनकर न रह जाएं । उनसे समाज के लिए कुछ निकल कर आए । विचारों का आदान-प्रदान हो, ताकि जड़वादी स्थितियां बदली जा सकें । छोटी-मोटी से उपर उठकर संवाद की स्वस्थ परंपरा को चलाने का प्रयास सतत चलते रहना चाहिए । इस प्रक्रिया की शुरुआत सर्वेश्वर छोटे-छोटे नगरों में देखन चाहते थे । वे मानते थे पर्वों और त्यौहारों पर सामाजिक चेतना की रोशनी के दायरे को फैलाना जरूरी हो गया है । होली एवं दीपावली के प्रसंगों पर सर्वेश्वर ने कई विचार एवं व्यंग्य प्रधान टिप्पणियां लिखी हैं । ‘होली मसखरी’ नामक एक टिप्पणी में उन्होंने हिंदी के साहित्यकारों की दशा पर व्यंग्य किए हैं ।

सर्वेश्वर कला एवं संस्कृति के क्षेत्र में नाटकबाजियों एवं चोंचलेबाजियों के खिलाफ थे । एक प्रसंग में दिल्ली में एलेक पदमसी के निर्देशन में ‘पागलखाना’ नामक नाटक का मंचन होना था । सो उक्त मंचन के धुंआधार विज्ञापन किए गए । लाखों रुपए के इस अपव्यय पर सर्वेश्वर कांप जाते हैं । संस्कृति के क्षेत्र में अर्थ के इस अनधिकार प्रवेश पर वे ‘विज्ञापन का पागलखाना’ नामक टिप्पणी में लिखते हैं – “संस्कृति के क्षेत्र में इतने विज्ञापन की क्या जरूरत है ?... क्या राजनीति का प्रभाव संस्कृति की दुनिया पर भी पड़ रहा है ? क्या संस्कृति का भी आदमी सोचने लगा है कि जिस तरह राजनीतिक ताकत, पैसे के जोर से हासिल की जा सकती है वैसे सांस्कृतिक प्रतिष्ठा भी पैसे के जोर से प्राप्त की जा सकती है ? यदि कोई ऐसा सोच रहा है तो उसे बताना होगा, भले ही देश की राजनीति में पैसे का हौवा चल रहा हो पर यह हौवा संस्कृति में नहीं चलेगा ।”26
(चरचे और चरखे पृ. 104)

सर्वेश्वर पैसे की अंधेरगर्दी पर हताश नहीं हैं । वे मानते हैं – यह वह जमीन है जहां पैसा नहीं, प्रतिभा ही टिकेगी । उन्होंने साफ कहा कि इस विज्ञापनबाजी से समर्पित संस्कृति कर्मियों के हौसले कम नहीं किए जा सकते । वे कहते हैं यह क्षेत्र प्रतिभा का है, व्यापार का नहीं । अपनी प्रतिभा के प्रति सर्वेश्वर का यह आशावाद निश्चय ही महत्वपूर्ण है ।

इसके अलावा सर्वेश्वर ने फिल्म, कला, संस्कृति के सवालों को गहरे मथा है । उन्होंने विदेशी फिल्मों पर कुछ टिप्पणियां लिखीं, तो कुछ धर्म एवं संस्कृति के सवालों पर, सबमें सर्वेश्वर की साफगोई और तल्खी दिखती है । वे अपनी बात को पूरी विनम्रता किंतु दृढ़ता से रखने के अभ्यासी हैं । भारतीय जन जीवन के संदर्भों की गहरी पकड़ के चलते वे उनमें रचे-बसे प्रतीकों एवं शब्दावलियों से अपनी बात को वजनदार बनाते हैं । सांस्कृतिक सवालों पर वे एक सकारात्मक दृष्टि से देखना चाहते थे । वे चाहते थे लोग संवाद की स्थितियां पैदा करें । एक सांस्कृतिक परिवेश बनाएं जहाँ लोग अपनी कलाधर्मिता को विकसित, पल्लवित होता देख सकें । सर्वेश्वर संस्कृति के जनधर्मी स्वरूप के आग्रही थे तथा उसके सरकारीकरण के खिलाफ थे । उनकी यह समझ संस्कृति की स्वायत्तता को लेकर थी, जो नहीं चाहती थी संस्कृतदि सत्ता प्रतिष्ठानों में लोटपोट होती दिखे ।

1 comment:

चण्डीदत्त शुक्ल said...

अच्छा लिखा, जमकर लिखा. अखबारी हड़बड़ाहट भी यहां नहीं है. यह क्रम बनाए रखें.